सारंगढ़-बिलाईगढ़सारंगढ़ जिला प्रशासन

करीब 100 एकड़ जमीन पर न्यायालय का स्टे (स्थगन आदेश) बावजूद जनसुनवाई का आयोजन को निरस्त करने ग्रामीणों की मांग

ईआईए रिपोर्ट में स्कूल, सार्वजनिक सड़क, मुक्तिधाम, ग्रामीण बस्तियों का कोई जिक्र नहीं

करीब 100 एकड़ जमीन पर न्यायालय का स्टे (स्थगन आदेश) बावजूद जनसुनवाई का आयोजन को निरस्त करने ग्रामीणों की मांग**

*गोमर्डा अभ्यारण महज 8.25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित।*
*ईआईए रिपोर्ट में स्कूल, सार्वजनिक सड़क, मुक्तिधाम, ग्रामीण बस्तियों का कोई जिक्र नहीं।*

*पर्यावरण विभाग बिना तस्तावेज जांच के इस अवैध प्रक्रिया में सहयोगी बना।*

*ग्रामीणों की आपबीती:*

*मासूम बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे – जहरीली धूल से स्वास्थ्य संकट।*
*खेत सूख रहे हैं, फसलें खराब हो रही हैं।*
*पेड़-पौधे मर रहे, जलस्तर घट रहा।*
*गंभीर बीमारियों का डर लगातार बढ़ता जा रहा।*

*ग्रामीणों की पुकार:*
*हमारा जीवन, स्वास्थ्य और भविष्य खतरे में है। प्रशासन व कंपनी की मिलीभगत से हमें बचाओ।

*सुनवाई का निष्पक्ष संचालन आवश्यक*
*पर्यावरण व मानवाधिकार आयोग, उच्च न्यायालय और राज्य सरकार से निष्पक्ष जांच की मांग।*
*इस मिलीभगत की सजा हो।*
*जनसुनवाई तत्काल निरस्त कराई जाए।*

*शुद्ध जल, साफ हवा और सुरक्षित जीवन – यह हर नागरिक का मौलिक अधिकार है।*
*जनसुनवाई का तमाशा: न्यायालय का स्टे, गोमर्डा अभ्यारण के नजदीक खदान और मासूमों की दहशत – प्रशासन व कंपनी की मिलीभगत पर ग्रामीणों का उग्र विरोध*

*पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र के पास हो रही अवैध जनसुनवाई – गंभीर अनियमितताओं के बीच किसानों और आमजन की चीखें*

सारंगढ़ खबर न्यूज,सारंगढ——–सारंगढ जिले के धौराभांठा पंचायत क्षेत्र में इसी माह 24 सितंबर को होने वाले लाइम स्टोन खदान परियोजना की अनैतिक जनसुनवाई को लेकर पूरे क्षेत्र में उबाल मचा हुआ है। स्थानीय किसान, ग्रामवासी, शिक्षक और आमजन मिलकर प्रशासन और परियोजना कंपनी पर आरोप लगा रहे हैं कि यह जनसुनवाई महज एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सांठगाठ से चल रहा तमाशा है, जो संवैधानिक आदेशों, पर्यावरण नियमों और जनता के हित का खुला उल्लंघन कर रहा है।

*गोमर्डा अभ्यारण की अनदेखी – संवेदनशील क्षेत्र पर संकट का साया*

परियोजना स्थल गोमर्डा अभ्यारण से मात्र 8.25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह क्षेत्र देश-विदेश के पर्यावरणविदों द्वारा संरक्षित घोषित किया गया है। इसके बावजूद ईआईए (Environmental Impact Assessment) रिपोर्ट में स्कूल, सार्वजनिक सड़क, मुक्तिधाम और जोगनीपाली सहित आसपास की बस्तियों का जिक्र तक नहीं किया गया। यह स्पष्ट संकेत है कि नियोजनकर्ताओं द्वारा महत्वपूर्ण साक्ष्य छुपाकर गड़बड़ी की योजना बनाई थी, ताकि विरोध की कोई राह न बचे।

*न्यायालय के स्टे आदेश की खुलेआम अवहेलना*

करीब 100 एकड़ जमीन पर स्थानीय कोर्ट का स्टे आदेश लागू होने के बावजूद जनसुनवाई का आयोजन बेधड़क रूप से किया जा रहा है। प्रशासन और परियोजना कंपनी मिलकर संवैधानिक नियमों को ताख पर रखकर गड़बड़ी को अंजाम दे रहे हैं। पर्यावरण विभाग ने भी बिना उचित दस्तावेज जांच के इस प्रक्रिया को अंजाम देकर खुद की जवाबदेही से हाथ खड़े कर अपने आप को किनारा किया हुआ है।

*ग्रामीणों की व्यथा – मासूमों की दहशत और खेतों की बर्बादी*

ग्रामीण बताते हैं कि खदान परियोजना शुरू होते ही उनका स्वास्थ्य, खेत और सामान्य जीवन अस्तित्व संकट में आ जाएगा। मासूम बच्चे जहरीली धूल, खतरनाक गैसों और प्रदूषित पानी के संपर्क में आकर बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। किसान जोर देकर कह रहे हैं –“अगर खेत नहीं बचे तो हम कैसे जियेंगे? हमारे बच्चे स्कूल नहीं जा पाएंगे क्योंकि उनके स्वास्थ्य पर संकट का खतरा मंडरा रहा है। उनकी व्यथा को सुनने वाला कोई नहीं। प्रशासन की चुप्पी और पर्यावरण विभाग की लापरवाही साफ बता रही है कि यह खेल सिर्फ कंपनी हित के लिए खेला जा रहा है।

ग्रामीणों की आपबीती:*

*मासूम बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे – जहरीली धूल से स्वास्थ्य संकट।*
*खेत सूख रहे हैं, फसलें खराब हो रही हैं।*
*पेड़-पौधे मर रहे, जलस्तर घट रहा।*
*गंभीर बीमारियों का डर लगातार बढ़ता जा रहा।*

*ग्रामीणों की पुकार:*
*हमारा जीवन, स्वास्थ्य और भविष्य खतरे में है। प्रशासन व कंपनी की मिलीभगत से हमें बचाओ।

*पर्यावरण विभाग की बड़ी चूक – संवैधानिक व्यवस्था पर तमाचा*

पर्यावरण विभाग ने बिना दस्तावेज सत्यापन व सही प्रक्रिया अपनाए जनसुनवाई का आयोजन करवाकर संवैधानिक व्यवस्था को मजाक बना दिया। इस मिलीभगत से साफ हो गया है कि परियोजना कंपनी को विशेष संरक्षण दिया जा रहा है।

*पर्यावरण विभाग की चालबाजी : छुपा दिया कार्यालय, जनता से छल*

रायगढ़ जिले के क्षेत्रीय पर्यावरण विभाग रायगढ़ ने जनता की आवाज दबाने की साजिश रच दी है। खदान परियोजना की जनसुनवाई से पहले विभाग ने अपने कार्यालय को घर जैसा बना दिया है। कोई बोर्ड नहीं, कोई सूचना नहीं – ताकि प्रभावित ग्रामीण दफ्तर का पता भी न लगा सकें। यह खुला अवैध कारनामा है। बिना पारदर्शिता के 24 सितंबर को जोगनीपाली में लाइम स्टोन खदान के लिए जनसुनवाई प्रस्तावित है। दर्जनों नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, जबकि विभाग चुपचाप काम कर रहा है। जनता का अधिकार छिनने की यह साजिश गंभीर अपराध के समान है। निष्पक्ष जांच के बिना यह जनसुनवाई पूरी तरह गैरकानूनी है। पुरे मामले में पर्यावरण अधिकारी अंकुर साहू इस संबंध में कुछ भी बोलने से बच रहे।

ग्रामीणों की स्पष्ट मांग –
1- अवैध जनसुनवाई तत्काल निरस्त की जाए।
2- उच्च न्यायालय, पर्यावरण मंत्रालय व मानवाधिकार आयोग द्वारा निष्पक्ष जाँच कराई जाए।
3- जनता के शुद्ध जल, स्वच्छ वायु और सुरक्षित जीवन के अधिकार की रक्षा सुनिश्चित हो।

*आगे का कदम – जनआन्दोलन की तैयारी*

यदि राज्य सरकार व संबंधित उच्चाधिकारी समय रहते कार्यवाही नहीं करते, तो बड़े पैमाने पर जन आंदोलन का रास्ता साफ है। ग्रामीण इस मिलीभगत के खिलाफ आवाज बुलंद करने को पूरी तरह तैयार हैं। उनका मानना है कि अन्यथा यह अनियमित प्रक्रिया न केवल पर्यावरण को बल्कि लोकतंत्र और संविधान को भी गहरा ठेस पहुंचाएगी। शुद्ध जल, साफ हवा और सुरक्षित जीवन – हमारा मौलिक अधिकार है। हम इसे किसी कीमत पर नहीं छोड़ेंगे। समय आ गया है कि न्यायालय, पर्यावरण मंत्रालय व मानवाधिकार आयोग इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर शासन व्यवस्था की पोल खोलें।जनसुनवाई तत्काल निरस्त होनी चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ी को स्वास्थ्य व प्रदूषण संकट से बचाया जा सके। यह अवैध जनसुनवाई मेसर्स ग्रीन सस्टेनेबल मेन्युफैचरिंग प्राइवेट लिमिटेड कंपनी को दिया जा रहा विशेष संरक्षण देने की कोशिश है।

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