प्रदेश के खेती प्रधान क्षेत्र लालाधुरूवा,जोगनीपाली में खदान का मंडरा रहा खतरा
200 हेक्टेयर भूमि पर प्रस्तावित ओपन कास्ट लाइम स्टोन खदान, पंचायतों और किसानों का खुला विरोध*

*प्रदेश के खेती प्रधान क्षेत्र लालाधुरूवा,जोगनीपाली में खदान का मंडरा रहा खतरा**
*200 हेक्टेयर भूमि पर प्रस्तावित ओपन कास्ट लाइम स्टोन खदान, पंचायतों और किसानों का खुला विरोध*
सारंगढ़ खबर न्यूज,सारंगढ——— खेती प्रधान छत्तीसगढ़ के सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले में किसानों और ग्रामीणों के लिए एक नई चुनौती खड़ी हो गई है।सारंगढ जिले के धौराभांठा पंचायत अंतर्गत आने वाले क्षेत्र के लालाधूरुवा और जोगनीपाली गांवों में ग्रीन सस्टेनेबल मैन्युफैक्चरिंग प्राइवेट लिमेटेड द्वारा 200 हेक्टेयर भूमि पर ओपन कास्ट लाइम स्टोन खदान का प्रस्ताव लाया गया है। इस खदान से प्रतिवर्ष 36 लाख टन लाइम स्टोन उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। ग्रामीणों का कहना है कि इस परियोजना से लगभग 90 प्रतिशत से अधिक कृषि भूमि प्रभावित होगी, जिससे उनकी जीविका संकट में आ जाएगी।
इस संबंध में पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट में इस बात की जानकारी दिया गया है कि 268 करोड़ की इस परियोजना में प्रतिवर्ष लगभग 36 लाख टन चूना पत्थर का उत्पादन किया जायेगा। इसके लिये 700 टीपीएच क्रेशर की स्थापना भी किया जायेगा। इसका खनन क्षेत्र गांव- लालधुरवा, जोगनिपाली, कपिस्दा, सरसरा और धौराभांटा, तहसील सारंगढ़, जिला- सारंगढ़-बिलाईगढ़ तथा खनन क्षेत्र – 200.902 हेक्टेयर है। खनन करने वाली कंपनी ग्रीन सस्टेनेबल मैन्युफैक्चरिंग प्राइवेट लिमिटेड परियोजना प्रस्तावक- मुकेश डालमिया (निदेशक)भुवनेश्वर, खोरधा, उड़ीसा के द्वारा इस परियोजना की स्वीकृति को लेकर लगातार कार्यवाही जारी रखी गई है।
*24 सितंबर को जनसुनवाई*
कलेक्टर कार्यालय से जारी सूचना के अनुसार, इस परियोजना पर 24 सितंबर को जनसुनवाई आयोजित की जाएगी। लेकिन किसानों और पंचायतों ने इस प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कई खसरा रकबा पहले से ही तहसीलदार न्यायालय में स्थगनाधीन हैं। बावजूद इसके, बिना निपटारा किए सुनवाई आगे बढ़ाना न्यायिक प्रक्रिया की अवहेलना है।
*पंचायतों की अनसुनी*
लालाधूरुवा, जोगनीपाली समेत आसपास की कई पंचायतों ने इस परियोजना का लिखित विरोध दर्ज कराया था। लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि न तो प्रशासन और न ही पर्यावरण विभाग ने उनकी शिकायतों पर ध्यान दिया। पंचायत प्रतिनिधियों का कहना है कि ग्राम सभाओं की अनुमति लिए बिना खदान की प्रक्रिया आगे बढ़ाना स्थानीय स्वशासन व्यवस्था की अनदेखी है।
*ईआईए रिपोर्ट पर सवाल*
पर्यावरण प्रभाव आंकलन (EIA रिपोर्ट) को लेकर भी ग्रामीणों ने गंभीर आपत्तियां दर्ज की हैं। उनका कहना है कि रिपोर्ट में आसपास के स्कूल, सड़क और श्मशान भूमि जैसी महत्वपूर्ण जगहों का उल्लेख ही नहीं है। ग्रामीणों का आरोप है कि यह अधूरी और भ्रामक रिपोर्ट है, जिस पर आधारित अनुमति देना आने वाली पीढ़ियों के साथ खिलवाड़ होगा।
*प्रदूषण और जीवन पर असर*
पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक, खदान शुरू होने के बाद खेतों की उपज पर नकारात्मक असर पड़ेगा, भूजल और तालाब, नदी-नालों का प्रदूषण बढ़ेगा, वायु और ध्वनि प्रदूषण से ग्रामीणों का स्वास्थ्य प्रभावित होगा। किसानों का कहना है कि यदि यह खदान शुरू हुई तो आने वाली पीढ़ियां खेती योग्य जमीन से वंचित हो जाएंगी।स्वास्थ संबंधी रिपोर्ट का कोई भी उल्लेख यहा पर नही है। धौराभांठा,गुड़ेली और टिमरलगा में ही बड़ी आबादी श्वास संबंधी बिमारी से ग्रस्त है। वही टी.बी.के भी बड़ी संख्या मे मरीज यहा पर पाये गये थे। इन सबका आंकड़ा इस रिर्पोट मे रखा ही नही गया है। क्रेशर उद्योग और चूना पत्थर भट्?टा के कारण से पर्यावरण पहले से ही प्रदूषित है इस खदान के खुलने से क्षेत्र मे पर्यावरण प्रदूषण का लेबल और भी ज्यादा होगा और आम लोगो को खुली हवा मे सांस लेने में तकलीफ होगी। वही आसपास के 10 किलोमीटर क्षेत्र मे 1.65 लाख की बड़ी आबादी इस खनन परियोजना के कारण से प्रदूषण की मार झेलेगें। ऐसे मे पर्यावरण प्रभाव आंकलन रिर्पोट महज कागज का पिटारा बन गया है। क्षेत्र की समस्याओ से इस कंपनी और छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल को कोई मतलब नही रह गया है।
*विरोध और मांगें*
ग्रामीण, किसान और सामाजिक संगठन इस खदान परियोजना का पुरजोर विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार को कृषि प्रधान प्रदेश में खदानों की बजाय ग्रीन और सस्टेनेबल मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना चाहिए।
*किसानों और पंचायतों की मुख्य मांगें*
1-जब तक कोर्ट में लंबित स्थगन का निपटारा नहीं होता, जनसुनवाई स्थगित की जाए।
2-पंचायतों की शिकायतों और आपत्तियों को गंभीरता से लिया जाए।
3-ईआईए रिपोर्ट को निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से दोबारा तैयार किया जाए।
4- प्रभावित किसानों को मुआवजा और वैकल्पिक रोजगार की गारंटी दी जाए।



