छत्तीसगढ़ के गांव-गांव में बासी-बचे सूखे चावल की खरीद : गुपचुप फलता-फूलता कारोबार, स्वास्थ्य और कानून दोनों पर सवाल**

**छत्तीसगढ़ के गांव-गांव में बासी-बचे सूखे चावल की खरीद : गुपचुप फलता-फूलता कारोबार, स्वास्थ्य और कानून दोनों पर सवाल**
सारंगढ खबर न्यूज,सारंगढ । छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में इन दिनों एक खामोश लेकिन तेजी से फैलता हुआ कारोबार चर्चा का विषय बना हुआ है। गांव-गांव में बाहरी लोग और बिचौलिये पहुंचकर घरों में बचे हुए बासी चावल को सुखाकर नगद में खरीद रहे हैं। यह काम न तो खुले बाजार में हो रहा है और न ही इसके उद्देश्य को लेकर कोई स्पष्ट जानकारी दी जा रही है परिणामस्वरूप ग्रामीणों में जहां एक ओर तात्कालिक आमदनी की खुशी है, वहीं दूसरी ओर यह सवाल गहराता जा रहा है कि आखिर इन चावलों का इस्तेमाल कहां और किस लिए किया जा रहा है?
**सुनियोजित तरीके से चल रहा है नेटवर्क**
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, यह कोई एक-दो गांव तक सीमित गतिविधि नहीं है, बल्कि कई विकासखंडों और जिलों तक फैला संगठित नेटवर्क है। कुछ ऐसा ही इनदिनों सारंगढ के ग्रामीण क्षेत्रों में हो रहा है जहाँ मोटरसाइकिल, पिकअप और छोटे वाहनों में सवार लोग गांव पहुंचते हैं, घर-घर जाकर बासी चावल के बारे में पूछताछ करते हैं और किलो के हिसाब से नकद भुगतान कर चावल इकट्ठा करते हैं। कई स्थानों पर यह खरीद साप्ताहिक और तय रेट पर की जा रही है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इसके पीछे सुनियोजित आपूर्ति श्रृंखला काम कर रही है।
**कहां हो रहा है उपयोग?**
ग्रामीण स्तर पर मिल रही जानकारी और जानकारों के अनुसार, इन बासी सूखे चावलों का उपयोग—अवैध शराब (हैंडिया/देशी मदिरा) बनाने में
मुर्गी, सूअर और मछली पालन में पशु आहार के रूप में
कुछ मामलों में री-प्रोसेसिंग कर मिलावटी खाद्य पदार्थों में तथा बाहरी राज्यों में औद्योगिक कच्चे माल के तौर पर किए जाने की आशंका जताई जा रही है। सबसे गंभीर चिंता यह है कि यदि यह चावल किसी भी रूप में मानव खाद्य श्रृंखला तक पहुंचता है, तो इसके परिणाम घातक हो सकते हैं।
**स्वास्थ्य से सीधा खिलवाड़**
चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि बासी चावल यदि लंबे समय तक खुले में रखे जाएं या गलत तरीके से सुखाए जाएं, तो उनमें फंगल, बैक्टीरिया और विषैले तत्व पनप जाते हैं। ऐसे चावल के सेवन से—फूड पॉइजनिंग
पेट और आंतों के गंभीर रोग
बच्चों और बुजुर्गों में जानलेवा संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। यह केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का गंभीर मुद्दा बन सकता है।
**गरीबों की मजबूरी, दलालों की चाल**
ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए बासी चावल बेचना एक आसान कमाई का साधन बनता जा रहा है। जो चावल पहले पशुओं को दे दिए जाते थे या फेंक दिए जाते थे, अब वही चावल नगद पैसे में बदल रहे हैं। इसी मजबूरी और लालच का फायदा उठाकर बिचौलिये ग्रामीणों को अंधेरे में रखकर यह कारोबार चला रहे हैं।
प्रशासनिक चुप्पी पर सवाल
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि इतना व्यापक कारोबार होने के बावजूद—
खाद्य एवं औषधि प्रशासन या स्थानीय पुलिस व पंचायत की ओर से अब तक कोई ठोस कार्यवाही या जागरूकता अभियान सामने क्यों नहीं आया? क्या यह गतिविधि नियमों के दायरे में है या अवैध? यदि अवैध है, तो कार्यवाही क्यों नहीं?
**सख्ती और जागरूकता दोनों जरूरी**
विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि चावल खरीदने वालों की तत्काल जांच और पंजीयन यह सुनिश्चित करना कि इसका उपयोग मानव भोजन में न हो ,अवैध शराब और मिलावट से जुड़े नेटवर्क पर कड़ी कार्यवाही तथा ग्रामीणों को इसके दुष्परिणामों के प्रति जागरूक करना अब समय की मांग बन चुका है।
छत्तीसगढ़ के गांवों में बासी-बचे सूखे चावल की खरीद कोई साधारण व्यापार नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, कानून और सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ा गंभीर मामला है। यदि समय रहते प्रशासन ने इस पर ध्यान नहीं दिया, तो यह गुपचुप कारोबार आने वाले समय में एक बड़े जनस्वास्थ्य संकट का कारण बन सकता है। अब जरूरत है सतर्कता, सख्ती और जागरूकता की—ताकि गांवों की मजबूरी को किसी बड़े खतरे में बदलने से रोका जा सके।



