शिक्षा विभागसारंगढ़-बिलाईगढ़

जिला कलेक्टर के आदेश की अवहेलना,अब तक जिला शिक्षा अधिकारी ने प्राईवेट स्कूलों की नही ली बैठक*

*जिला कलेक्टर के आदेश की अवहेलना,अब तक जिला शिक्षा अधिकारी ने प्राईवेट स्कूलों की नही ली बैठक**
**सारंगढ खबर अखबार में प्रकाशित प्राईवेट स्कूलों में शिक्षा के नाम पर हो रहे लूट मुद्दा को प्रमुखता से उठाया**
**संवेदनशील कलेक्टर ने मुद्दा को गंभीरता से लेते हुए जिला अधिकारी को सभी स्कूलों के बैठक करने दीये निर्देश**

*सारंगढ़-बिलाईगढ़ में शिक्षा के नाम पर ‘लूट’! स्कूलों की मनमानी से परेशान अभिभावक*

*फीस वृद्धि, ड्रेस-किताबों की अनिवार्यता और छिपे शुल्कों ने बढ़ाई चिंता—नियमन पर उठे सवाल*

सारंगढ़-बिलाईगढ़। जिले के संवेदनशील कलेक्टर संजय कन्नौजे को सारंगढ जिला में तेजी से हो रहे विकास करने वाले अधिकारी के नाम से जाना जाता है। पिछले सप्ताह सारंगढ खबर अखबार ने जिले में सभी प्राइवेट स्कूलों में शिक्षा के नाम पर हो रहे लूट की खबर प्रमुखता से उठाया था जिस पर कलेक्टर ने सारंगढ जिला शिक्षा अधिकारी जे आर डहरिया को जिले के सभी प्राइवेट स्कूलों के साथ बैठक कर जानकारी लेने के निर्देश दिये थे परंतु आज पर्यन्त तक जिला शिक्षा अधिकारी ने प्राइवेट स्कूलों के साथ बैठक कर जानकारी नहीं लिया,इससे साफ पता चलता है जिले के विकास पुरुष संवेदनशील कलेक्टर के निर्देश का पालन नही किया गया है।आपको बता दे कि सारंगढ जिले में जितने भी प्राइवेट स्कूल है उन स्कूलों में हाई क्लास,मिडिल क्लास सहित गरीब व किसान के बच्चे भी पढ़ाई करते है जिनमे अधिकतर स्कूलों के द्वारा पढ़ाई के नाम पर बच्चों और अभिभावकों को किसी न किसी स्तर से लूटा जाता है।इसलिए निजी स्कूलों की कार्यप्रणाली को लेकर अभिभावकों में गहरा आक्रोश देखने को मिल रहा है। शिक्षा के नाम पर बढ़ती फीस, अनावश्यक शुल्क और जबरन खरीददारी के चलते अभिभावक खुद को आर्थिक शोषण का शिकार मान रहे हैं। हालात ऐसे बन गए हैं कि अब यह मुद्दा जनचर्चा का विषय बन चुका है और प्रशासन की निष्क्रियता पर भी सवाल उठने लगे हैं। जिले के कई निजी स्कूलों में हर वर्ष बिना ठोस कारण के फीस में बढ़ोतरी कर दी जाती है। ट्यूशन फीस के अलावा वार्षिक शुल्क, विकास शुल्क, स्मार्ट क्लास शुल्क, परीक्षा शुल्क और अन्य कई नामों से राशि वसूली जाती है। अभिभावकों का कहना है कि इन शुल्कों का स्कूल प्रबंधन द्वारा कोई स्पष्ट हिसाब नहीं दिया जाता, जिससे पारदर्शिता पर सवाल खड़े होते हैं। सबसे गंभीर और विवादास्पद मामला स्कूलों द्वारा जबरन सामान खरीदने का है। अभिभावकों का आरोप है कि कई निजी स्कूलों ने अपने स्तर पर यह नियम बना दिया है कि वहां पढ़ने वाले बच्चों को कॉपी, किताबें, बैग, जूते और मोजे केवल स्कूल द्वारा निर्धारित दुकान या स्वयं स्कूल से ही खरीदने होंगे। यह पूरी तरह से नियम विरुद्ध है। शिक्षा से जुड़े नियमों के अनुसार अभिभावक स्वतंत्र हैं कि वे बच्चों का शैक्षणिक सामान किसी भी दुकान से खरीद सकते हैं, लेकिन इसके बावजूद स्कूल प्रबंधन अपनी मनमानी थोप रहा है। अभिभावकों का कहना है कि यदि वे बाहर से सामान खरीदते हैं, तो बच्चों पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाया जाता है या उन्हें असुविधा का सामना करना पड़ता है। मजबूरी में अभिभावकों को स्कूल से ही अधिक दामों पर सामान खरीदना पड़ता है। इस पूरी प्रक्रिया में स्कूल प्रबंधन और संबंधित दुकानदारों के बीच मिलीभगत की आशंका भी जताई जा रही है। कई अभिभावकों ने साफ कहा कि यह केवल शिक्षा नहीं, बल्कि खुलेआम व्यापार बन चुका है, जहां बच्चों के नाम पर अभिभावकों की जेब ढीली कराई जा रही है। ट्रांसपोर्ट सुविधा के नाम पर भी मोटी रकम वसूली जा रही है। बसों की स्थिति और सुरक्षा मानकों पर सवाल उठने के बावजूद फीस में कोई कमी नहीं की जाती। ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले छात्रों के अभिभावकों के लिए यह अतिरिक्त बोझ और भी भारी पड़ता है। स्कूलों में विभिन्न गतिविधियों—जैसे वार्षिक उत्सव, खेलकूद, पिकनिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम—के नाम पर भी अलग-अलग शुल्क वसूले जाते हैं। कई बार इन गतिविधियों को अनिवार्य बताया जाता है, जबकि वास्तविकता में इनका लाभ सीमित बच्चों तक ही पहुंचता है। इसके बावजूद सभी अभिभावकों से शुल्क लिया जाता है। एडमिशन के दौरान डोनेशन या कैपिटेशन फीस की मांग भी एक बड़ी समस्या बनकर सामने आ रही है। यह पूरी तरह से गैरकानूनी है, फिर भी कई स्कूलों में इसे अप्रत्यक्ष रूप से लागू किया जा रहा है। अभिभावक विरोध करने से डरते हैं, क्योंकि उन्हें अपने बच्चों के भविष्य की चिंता रहती है। कोविड-19 के बाद आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद स्कूलों ने फीस में कोई राहत नहीं दी है। कई परिवारों को बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए कर्ज लेना पड़ रहा है, जबकि कुछ अभिभावक मजबूरी में सरकारी स्कूलों की ओर रुख कर रहे हैं। इस पूरे मामले में प्रशासन की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। फीस नियंत्रण और स्कूलों की मनमानी रोकने के लिए नियम तो बनाए गए हैं, लेकिन उनका पालन जमीनी स्तर पर नहीं हो रहा। अभिभावकों की शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई नहीं होने से स्कूल प्रबंधन के हौसले बुलंद हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का समाधान सख्त नियमन और पारदर्शिता से ही संभव है। स्कूलों को अपनी फीस संरचना और अन्य शुल्कों का स्पष्ट विवरण सार्वजनिक करना चाहिए। साथ ही, अभिभावकों को भी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होकर संगठित रूप से आवाज उठानी होगी।अभिभावक संघ यदि सक्रिय भूमिका निभाएं, तो इस तरह की मनमानी पर अंकुश लगाया जा सकता है। वहीं, प्रशासन को भी नियमित निरीक्षण, शिकायत निवारण प्रणाली को मजबूत करने और दोषी स्कूलों पर सख्त कार्रवाई करने की जरूरत है।

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