ब्राह्मण समाज के गौरव थे स्वर्गीय बुद्धेश्वर तिवारी, सेवा, संस्कार और समर्पण की विरासत छोड़ गए

ब्राह्मण समाज के गौरव थे स्वर्गीय बुद्धेश्वर तिवारी, सेवा, संस्कार और समर्पण की विरासत छोड़ गए
सारंगढ़। ग्राम अमझर की पावन धरती पर जन्मे ब्राह्मण समाज के गौरव, सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी, समाजसेवी एवं धार्मिक कार्यों के अग्रणी स्वर्गीय बुद्धेश्वर तिवारी का 15 अगस्त, स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर ब्रह्मलीन होना पूरे सारंगढ़-बिलाईगढ़ अंचल के लिए अपूरणीय क्षति माना जा रहा है। उन्होंने अपने जीवन में ईमानदारी, सादगी, सेवा और संस्कारों को सर्वोच्च स्थान दिया तथा परिवार, समाज और धार्मिक संस्थाओं के लिए ऐसी प्रेरणादायी विरासत छोड़ गए, जिसे लंबे समय तक याद किया जाएगा।
स्वर्गीय तिवारी ने जीवनभर अपने पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन अत्यंत संवेदनशीलता और आत्मीयता के साथ किया। उन्होंने हर रिश्ते को सम्मान दिया और बिना किसी छल-कपट के सहज, सरल एवं मर्यादित जीवन जीकर समाज के सामने आदर्श प्रस्तुत किया। बैंक अधिकारी के रूप में उनकी पहचान एक कर्तव्यनिष्ठ, अनुशासित और निष्पक्ष अधिकारी की रही। उन्होंने न केवल अपने दायित्वों का पूरी ईमानदारी से निर्वहन किया, बल्कि नव नियुक्त बैंक कर्मचारियों को मार्गदर्शन देकर उन्हें कार्य की बारीकियां समझाईं और कठिन परिस्थितियों में समाधान का रास्ता भी बताया। इसी कारण वे सहकर्मियों के बीच प्रेरणास्रोत के रूप में जाने जाते थे।
सारंगढ़ के बड़े मठपारा में निवास करने के बावजूद उनका अपने पैतृक गांव अमझर से गहरा भावनात्मक जुड़ाव कभी कम नहीं हुआ। वे मानते थे कि गांव की प्रगति शिक्षा और संस्कारों से ही संभव है। इसी सोच के साथ उन्होंने गांव के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को पढ़ाई और चरित्र निर्माण के लिए प्रतिवर्ष प्रोत्साहन राशि देने की परंपरा शुरू की, जिससे अनेक बच्चों को आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली।
सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने अपना अधिकांश समय समाज सेवा और धार्मिक कार्यों को समर्पित कर दिया। श्री गोपाल जी धर्मादा ट्रस्ट के सचिव के रूप में उन्होंने ट्रस्ट की गतिविधियों को नई गति दी तथा ग्राम केदार में धर्मशाला के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देकर जनसेवा का उदाहरण प्रस्तुत किया।
वहीं भगवान श्री परशुराम सेवा समिति के अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने बिखराव की स्थिति में पहुंच चुकी समिति का पुनर्गठन किया। समिति का नवीनीकरण कराया, वर्षों से उपेक्षित भवन का पुनः कब्जा प्राप्त कर उसका डेंटिंग-पेंटिंग कराकर समाज के उपयोग योग्य बनाया। उनके नेतृत्व में समिति को नई ऊर्जा और नई दिशा मिली।
स्वर्गीय बुद्धेश्वर तिवारी सदैव अपनी माता भानुमति देवी को अपना प्रथम गुरु मानते थे। मातृ ऋण को समाज सेवा के माध्यम से चुकाने के उद्देश्य से उन्होंने अमझर विद्यालय में “भानुमति बालक एवं बालिका प्रतिभा प्रोत्साहन योजना” प्रारंभ कराई। इस योजना के लिए समिति गठित कर स्थायी निधि सावधि जमा में रखी गई, जिसके ब्याज से प्रतिवर्ष कक्षा आठवीं में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले छात्र और छात्रा को सम्मानित किया जाता है। यह योजना आज भी शिक्षा के प्रति उनके समर्पण की जीवंत मिसाल है।
स्वर्गीय बुद्धेश्वर तिवारी का संपूर्ण जीवन इस सत्य का प्रमाण रहा कि व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसके पद से नहीं, बल्कि उसके कर्म, सेवा और संस्कारों से होती है। उनके निधन से विप्र समाज, सारंगढ़ नगर, अमझर ग्राम तथा विभिन्न सामाजिक और धार्मिक संगठनों ने एक ऐसे कर्मयोगी, मार्गदर्शक और समाजसेवी को खो दिया है, जिनकी कमी लंबे समय तक महसूस की जाएगी। उनके द्वारा किए गए जनकल्याणकारी कार्य और उच्च जीवन मूल्य आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणापुंज बने रहेंगे।



