पांच लाईम स्टोन के ब्लॉक में होगा खनन, पुनर्वास नीति का पता नहीं

कई किसान हो रहे भूमिहीन, एकमुश्म राशि की परिभाषा बदलनी होगी, 20 साल पुरानी दर पर ही टिकी व्यवस्था
सारंगढ खबर न्यूज। सरकार के लिए किसान की खेतिहर भूमि की कोई कीमत ही नहीं है। कोई भी खनिज ब्लॉक हो, चुटकियों में कृषि भूमि आवंटित कर दी जाती है। कोई नहीं देखता कि जमीनें खोने के बाद उस किसान परिवार की आजीविका कैसे चल रही है। सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले में लाइमस्टोन के चार ब्लॉक से खनन होगा जिसमें किसानों की निजी भूमि ली जाएगी। किसी में भी पुनर्वास नीति नहीं बनाई गई है। भू-अर्जन नीति में मुआवजे के अलावा पुनर्वास नीति को समान महत्व दिया गया है। इसके तहत प्रभावित परिवार को रोजगार, एकमुश्त राशि, प्रतिमाह भत्ता आदि दिया जाता है। प्लांट या कोयला खदानों में अलग से पुनर्वास लाभ दिया जाता है। इस बार मामला लाइमस्टोन माइंस का है। सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले में चार लाइमस्टोन ब्लॉक्स चिह्नित किए गए हैं।
पहला ब्लॉक धौंराभाठा, लालाधुरवा, जोगनीपाली, कपिस्दा और सरसरा की 200.902 हे. हेक्टेयर जमीन पर शुरू होगा है। इसका आवंटन ग्रीन सस्टेनेबल मैन्युफैक्चरिंग प्रालि को किया गया है। इसमें 190 हे. किसानों की निजी कृषि भूमि है। करीब 5 हे. शासकीय भूमि और 6 हे. वन भूमि भी है। पांच गांवों की 190 हे. खेतिहर भूमि पर लाइमस्टोन खनन होगा लेकिन जमीन कैसे ली जाएगी, इसका कोई तरीका तय नहीं किया गया है। मतलब कंपनी को अपने हिसाब से किसानों से जमीन खरीदनी होगी।
दूसरा ब्लॉक खैरहा ब्लॉक है, जिसमें सारंगढ़ नपा के वार्ड 10, रांपागुला, चंदाई की 227.607 हे. भूमि ली जाएगी। शहर के वार्ड दस की करीब 74 हे. जमीन जा रही है। मतलब शहर किनारे ही विशाल खदान खुल जाएगी। तीसरा कुटेला-दुर्गापाली ब्लॉक है, जिसमें हरिहरपाली, कुटेला वार्ड 1 और खम्हारडीह की 74.971 हे. भूमि ली जाएगी। चौथा खम्हारडीह ब्लॉक है जिसमें भैंसादहान, भोजपुर वार्ड 2, गाताडीह, खम्हारडीह, कुटेला वार्ड 1, पचपेड़ी और सुलोनी की 468.469 हे. भूमि ली जाएगी। मतलब चार ब्लॉक मिलाकर करीब 1000 हे. भूमि ली जाएगी।
कौन बनाएगा पुनर्वास नीति, पता नहीं
चार लाइमस्टोन ब्लॉक को 1000 हे. जमीन दी जाएगी। इसके लिए कोई अधिग्रहण नहीं होगा। खनिज विभाग और एसडीएम ही इसके लिए सक्षम हैं। कई किसान अपनी पूरी जमीन खो देंगे। पुश्तैनी जमीनें खोने के बाद उनके पास आजीविका के लिए कहीं छोटी-मोटी नौकरी करना ही अंतिम विकल्प है। या फिर उनको गांव छोडक़र दूसरे गांव में बसना होगा। हैरानी की 300 से ज्यादा परिवारों की आजीविका का साधन छिन जाने के बाद कोई पुनर्वास नीति ही नहीं है। पुनर्वास हक के तौर पर उनको क्या दिया जाएगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। ग्रामीणों से भी इस जानकारी को छिपाया जा रहा है।



