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बच्चों का भविष्य छोड़ नेतागिरी में व्यस्त शिक्षक** **सरकारी वेतन पढ़ाने का या राजनीति करने का?

**बच्चों का भविष्य छोड़ नेतागिरी में व्यस्त शिक्षक**

**सरकारी वेतन पढ़ाने का या राजनीति करने का?**
**सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले में शिक्षकों की कार्यशैली पर उठ रहे सवाल, स्कूलों में पढ़ाई छोड़ कर्मचारी संगठनों की गतिविधियों में सक्रिय रहने वाले शिक्षकों पर प्रशासन कब करेगा कार्रवाई?**
सारंगढ़। शिक्षा को समाज की रीढ़ और शिक्षक को राष्ट्र निर्माण का आधार माना जाता है, लेकिन जब शिक्षक ही अपनी मूल जिम्मेदारी से विमुख होकर नेतागिरी और संगठनात्मक गतिविधियों में अधिक समय देने लगें, तो इसका सीधा असर बच्चों के भविष्य पर पड़ना स्वाभाविक है। सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले में कुछ शिक्षकों की कार्यशैली को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि कई शिक्षक विद्यालय में नियमित रूप से शिक्षण कार्य पर ध्यान देने के बजाय कर्मचारी संगठनों की गतिविधियों, ज्ञापन, धरना-प्रदर्शन और नेतागिरी में अधिक रुचि दिखा रहे हैं।
शासन शिक्षकों को सरकारी खजाने से वेतन इसलिए देता है, ताकि वे विद्यालयों में बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे सकें, उनका शैक्षणिक स्तर सुधार सकें और उन्हें बेहतर भविष्य के लिए तैयार कर सकें। लेकिन यदि शिक्षक अपनी शिक्षकीय जिम्मेदारियों से समय निकालकर लगातार संगठनात्मक गतिविधियों में व्यस्त रहते हैं, तो सबसे बड़ा नुकसान उन विद्यार्थियों का होता है, जिनके भविष्य की जिम्मेदारी इन्हीं शिक्षकों के कंधों पर है।
कर्मचारी संगठनों का गठन और अपनी जायज मांगों के लिए आवाज उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है। शिक्षकों की समस्याओं और अधिकारों की अनदेखी भी नहीं की जानी चाहिए, लेकिन संगठनात्मक गतिविधियों और शिक्षकीय दायित्वों के बीच संतुलन बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। शिक्षक का पहला दायित्व विद्यालय और विद्यार्थी के प्रति होना चाहिए।
सवाल यह भी है कि जिन विद्यालयों में बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है, वहां जिम्मेदारी किसकी है? क्या शिक्षा विभाग को इस बात की जानकारी है कि कौन शिक्षक नियमित रूप से अध्यापन कार्य कर रहा है और कौन अपनी शासकीय जिम्मेदारियों के बजाय अन्य गतिविधियों में व्यस्त है?
जिला प्रशासन एवं शिक्षा विभाग को चाहिए कि जिले के शासकीय विद्यालयों में शिक्षकों की नियमित उपस्थिति, अध्यापन कार्य और शैक्षणिक गतिविधियों की निष्पक्ष जांच कराई जाए। यदि कोई शिक्षक बिना स्वीकृत अवकाश या अधिकृत अनुमति के अपने कर्तव्य से अनुपस्थित पाया जाता है, तो नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
आखिरकार, शिक्षक का सम्मान उसके पद या संगठन में उसकी हैसियत से नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के जीवन में उसके योगदान से तय होता है। बच्चों के भविष्य के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं होना चाहिए।

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