chhattisgarhCmo chhattisgarhdprpibsarangarhTop newsUncategorizedजिला सारंगढ-बिलाईगढ़धर्म अध्यात्म

आज है सारंगढ़ का ऐतिहासिक रियासतकालीन दशहरा — गढ़ विच्छेदन

**आज है सारंगढ़ का ऐतिहासिक रियासतकालीन दशहरा — गढ़ विच्छेदन

**गढ़ विच्छेदन में झलकती है वीरता, राजपरंपरा और इतिहास की विरासत**
**राजमहल की मिट्टी से बनता था गढ़, विजय हासिल करने वाले वीर को मिलता था राजकीय सम्मान** **रावण दहन की शुरुआत 1978 में होने का स्थानीय इतिहास में उल्लेख**

सारंगढ़ खबर न्यूज,सारंगढ——-

सारंगढ़ में रियासत काल से चली आ रही गढ़ विच्छेदन एवं रावण दहन की ऐतिहासिक परंपरा शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व विजयादशमी के दिन बड़े धूमधाम एवं उत्साह के साथ मनाई जाती है।

इस ऐतिहासिक आयोजन में सारंगढ़ राजा के उद्बोधन के पश्चात गढ़ विच्छेदन का कार्यक्रम प्रारंभ होता है। यह अनूठी परंपरा सारंगढ़ की ऐतिहासिक विरासत, सांस्कृतिक गौरव और परंपराओं का प्रतीक है।
छत्तीसगढ़ के सारंगढ़ का दशहरा अपनी विशिष्ट गढ़ विच्छेदन परंपरा के कारण अलग पहचान रखता है। जहां देश के अधिकांश हिस्सों में विजयादशमी का प्रमुख आकर्षण रावण दहन होता है, वहीं सारंगढ़ में रियासतकाल से चली आ रही गढ़ चढ़ाई की परंपरा इस पर्व का ऐतिहासिक आकर्षण रही है। इस आयोजन में मिट्टी से बने गढ़ पर चढ़कर विजय प्राप्त करने वाले प्रतिभागी के साहस और शारीरिक क्षमता का प्रदर्शन होता है। जिला प्रशासन भी इसे सारंगढ़ की महत्वपूर्ण सांस्कृतिक विरासत के रूप में दर्ज करता है।इस रियासत कालीन दशहरा को देखने के लिए सारंगढ क्षेत्र के लाखों लोगों की भीड़ उमड़ती है,जो सारंगढ दशहरा को देश और प्रदेश में एक अलग पहचान दिलाती है।

**राजा जवाहिर सिंह के काल से जुड़ी है परंपरा**

सारंगढ़ की रियासत का इतिहास गोंड राजवंश और राजपरिवार की परंपराओं से जुड़ा रहा है। स्थानीय ऐतिहासिक लेखों में दशहरा पर्व पर गढ़ तोड़ने की परंपरा का आरंभ राजा जवाहिर सिंह के शासनकाल से संबंधित बताया गया है। हालांकि, इसकी शुरुआत का सटीक वर्ष बताने वाला प्रमाणित राजकीय अभिलेख सार्वजनिक स्रोतों में स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं है।
कुछ स्थानीय समाचार रिपोर्ट इस परंपरा को 200 वर्ष से भी अधिक पुराना बताती हैं, जबकि पर्यटन संबंधी विवरण इसे 100 वर्ष से अधिक पुरानी परंपरा के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इसलिए इसकी वास्तविक प्राचीनता निर्धारित करने के लिए राजपरिवार के अभिलेखों और पुराने दस्तावेजों का अध्ययन आवश्यक है।

**राजमहल की मिट्टी से तैयार होता था गढ़**

गढ़ विच्छेदन की परंपरा में राजमहल की मिट्टी का विशेष महत्व बताया जाता है। जिला प्रशासन के विवरण के अनुसार, राजमहल की मिट्टी, जिसे वीरभूमि की मिट्टी भी कहा जाता है, से शंकु के आकार का मिट्टी का गढ़ तैयार किया जाता है। विजयादशमी के अवसर पर प्रतिभागी इस गढ़ पर चढ़ने का प्रयास करते हैं। फिसलन भरी सतह के कारण बार-बार नीचे गिरने के बाद भी वे दोबारा चढ़ाई करते हैं।
स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों में गढ़ को मिट्टी और गोबर के लेप से चिकना करने का उल्लेख मिलता है। कुछ विवरणों में गढ़ के नीचे पानी से भरा गड्ढा, चढ़ाई में इस्तेमाल किए जाने वाले लोहे के पंजेनुमा उपकरण तथा ऊपर मौजूद रक्षकों की बाधाओं का भी वर्णन है। इन सभी बातों को पुराने आयोजन के स्थानीय विवरणों के रूप में देखा जाना चाहिए, क्योंकि प्रत्येक रस्म की स्वतंत्र अभिलेखीय पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

**गढ़ पर विजय ही वीरता की पहचान**

स्थानीय परंपरा के अनुसार, पुराने समय में गढ़ पर चढ़ाई केवल एक खेल नहीं थी, बल्कि साहस और शारीरिक क्षमता प्रदर्शित करने का माध्यम थी। गढ़ के शीर्ष तक पहुंचकर विजय हासिल करने वाले प्रतिभागी को विशेष सम्मान मिलता था। स्थानीय इतिहास के कुछ विवरणों में बताया गया है कि विजेता गढ़ पर लगा विजय-चिह्न या ध्वज लेकर राजा के समक्ष पहुंचता था।
कुछ लोक-ऐतिहासिक विवरणों में राजा द्वारा विजेता को तिलक लगाने, नारियल और धोती देकर सम्मानित करने तथा राजदरबार में स्थान देने का उल्लेख मिलता है। यह भी बताया जाता है कि राजा के दरबार में सामंत, जमींदार और गांवों के प्रतिनिधि उपस्थित होते थे। इन रस्मों का विस्तृत क्रम स्थानीय परंपराओं और लेखों में मिलता है, लेकिन इन्हें प्रमाणित राजकीय अभिलेखों से पुष्ट करना अभी शेष है।
जिला प्रशासन के अनुसार, पुराने समय में प्रतियोगिता में अपनी बहादुरी दिखाने वाले लोगों को राजा की सेना में भर्ती किया जाता था। इससे यह संकेत मिलता है कि गढ़ विच्छेदन का संबंध राजकीय शौर्य और सैनिक क्षमता से भी रहा होगा।

**गढ़ विच्छेदन से जुड़ी राजकीय परंपरा**

सारंगढ़ के दशहरे में राजपरिवार की भूमिका ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रही है। वर्तमान समय में भी गढ़ विच्छेदन की परंपरा राजपरिवार द्वारा निभाई जाती है। जिला प्रशासन के अनुसार, वर्तमान स्वरूप में प्रतियोगिता के विजेता को नकद पुरस्कार और शील्ड से सम्मानित किया जाता है।
स्थानीय समाचार विवरणों में विजयादशमी पर राजपरिवार की उपस्थिति, आयोजन के शुभारंभ तथा विजेता को सम्मानित करने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। हालांकि, पुराने राजकीय जुलूस, पूजा-विधि और दरबार के सभी चरणों का प्रमाणित, वर्षवार विवरण सार्वजनिक स्रोतों में उपलब्ध नहीं है।

**रावण दहन की शुरुआत 1978 में होने का उल्लेख**

सारंगढ़ के दशहरे में गढ़ विच्छेदन के साथ रावण दहन भी आज प्रमुख आकर्षण है। स्थानीय इतिहासकार के एक लेख और क्षेत्रीय समाचार रिपोर्ट में अक्टूबर 1978 में पहली बार रावण दहन शुरू होने का उल्लेख मिलता है। इन विवरणों में टेकचंद गिरी, जिन्हें स्थानीय लोग बाबाजी के नाम से जानते थे, की भूमिका का भी उल्लेख किया गया है।
इस विवरण के अनुसार, रावण दहन के जुड़ने से दशहरा आयोजन के स्वरूप में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया। हालांकि, 1978 की घटना की स्वतंत्र पुष्टि के लिए उस समय के समाचार पत्रों, आयोजन समिति के दस्तावेजों अथवा प्रत्यक्षदर्शियों के अभिलेखों का मिलान जरूरी है।

**लोकपरंपरा में आज भी जीवित है ऐतिहासिक पहचान**

सारंगढ़ का गढ़ विच्छेदन केवल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि रियासतकालीन इतिहास, राजपरिवार की परंपरा और स्थानीय सामूहिक स्मृति से जुड़ा सांस्कृतिक आयोजन है। राजमहल की मिट्टी से गढ़ बनाना, उस पर चढ़ाई करना और विजेता को सम्मानित करना इसकी विशिष्ट पहचान है।
इस परंपरा के इतिहास को अधिक प्रामाणिक रूप में सामने लाने के लिए राजपरिवार के पुराने दस्तावेजों, रियासतकालीन गजेटियर, स्थानीय समाचार पत्रों और बुजुर्ग प्रत्यक्षदर्शियों की मौखिक स्मृतियों का संकलन आवश्यक है। इससे न केवल गढ़ विच्छेदन की शुरुआत का समय स्पष्ट हो सकेगा, बल्कि उन पुरानी रस्मों का क्रम भी सामने आ सकेगा जो आज स्थानीय सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं।
सारंगढ़ का दशहरा इस प्रकार इतिहास और वर्तमान के बीच एक सांस्कृतिक सेतु है, जिसमें गढ़ पर चढ़ाई की परंपरा आज भी रियासतकालीन स्मृति को जीवित रखे हुए है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button