रोजगार की मजबूरी ने ली एक और जान… कब रुकेगा पलायन, कब जागेगा सिस्टम?*

*कुलगाम आतंकी हमले में सारंगढ़ के युवक की मौत, पूरे जिले में शोक और गुस्सा*
सारंगढ़-बिलाईगढ़।जम्मू-कश्मीर के कुलगाम में हुए आतंकी हमले ने एक बार फिर उस कड़वे सच को सामने ला दिया है, जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं,”रोजगार के लिए मजबूर पलायन”। सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के धनसीर छुईहा गांव निवासी 28 वर्षीय प्रवासी मजदूर भूपेंद्र भैना का आतंकी हमले में श्रीनगर के अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई। वह अपनी पत्नी के साथ रोजी-रोटी की तलाश में हजारों किलोमीटर दूर गए थे, लेकिन घर लौटने से पहले ही जिंदगी की डोर टूट गई।
*एक मौत नहीं, पूरे परिवार का बिखरना*
भूपेंद्र अपने पीछे दो साल का मासूम बेटा, बुजुर्ग दादी और बहन को छोड़ गए हैं।माता-पिता भी रोजगार के सिलसिले में हिमाचल प्रदेश में हैं। इस घटना ने एक ही झटके में परिवार की आर्थिक और भावनात्मक रीढ़ तोड़ दी है। गांव में मातम पसरा है, हर आंख नम है और हर दिल में एक ही सवाल उठ रहा है की क्या यही विकास है, जहां रोजगार के लिए जान गंवानी पड़े?
*30 प्रतिशत से ज्यादा आबादी का पलायन, जोखिम भरी जिंदगी*
सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के लगभग 30 प्रतिशत से अधिक लोग हर साल रोजगार के लिए दूसरे राज्यों की ओर पलायन करते हैं। हैदराबाद, झारखंड, ओडिशा और जम्मू-कश्मीर जैसे क्षेत्रों में मजदूरी करने वाले इन लोगों के सामने हर दिन नया खतरा खड़ा रहता है। कभी बंधक बनने की घटनाएं, कभी सड़क हादसे, तो कभी आतंक का साया—इसके बावजूद मजबूरी उन्हें घर से दूर धकेल रही है।
*सिस्टम पर सवाल—जिले में रोजगार क्यों नहीं?*
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर जिले में ही रोजगार के पर्याप्त अवसर क्यों नहीं हैं? क्या स्थानीय स्तर पर उद्योग, स्वरोजगार और कौशल विकास की योजनाएं प्रभावी तरीके से लागू नहीं हो रहीं? अगर समय रहते रोजगार के साधन विकसित किए जाते, तो शायद भूपेंद्र आज जिंदा होते। यह घटना सीधे तौर पर नीतियों और उनके क्रियान्वयन पर सवाल खड़ा करती है।
*कुल 36 लाख मुआवजा घोषित, लेकिन क्या इतना काफी है?*
घटना के बाद दोनों राज्यों की सरकारों द्वारा पीड़ित परिवार के लिए मुआवजा राशि की घोषणा की गई है और तत्काल राहत के रूप में कुछ आर्थिक सहायता भी प्रदान की गई है। हालांकि, सवाल यह उठता है कि क्या केवल मुआवजा इस गहरे जख्म को भर सकता है? क्या इससे उस मासूम बच्चे का भविष्य सुरक्षित हो पाएगा, जिसने अपने पिता को खो दिया?
*पीड़ित परिवार के लिए सहायता और ठोस नीति की मांग*
स्थानीय लोगों ने शासन-प्रशासन से पीड़ित परिवार को समुचित आर्थिक सहायता, नौकरी और दीर्घकालिक सहयोग देने की मांग की है। साथ ही यह भी कहा है कि केवल मुआवजा काफी नहीं, बल्कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए स्थायी समाधान जरूरी है। प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा, पंजीकरण और आपातकालीन सहायता की व्यवस्था को भी मजबूत करने की जरूरत है।
*चेतावनी है यह घटना—अब भी नहीं चेते तो देर होगी*
भूपेंद्र भैना का अंतिम संस्कार कश्मीर में ही कर दिया गया, लेकिन उनके जाने का दर्द पूरे जिले में गूंज रहा है। यह सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। अगर अब भी शासन और प्रशासन ने पलायन रोकने और स्थानीय रोजगार बढ़ाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए, तो ऐसे हादसे आगे भी कई परिवारों को उजाड़ते रहेंगे। अब वक्त है फैसले का—सिर्फ संवेदना जताने का नहीं, बल्कि ऐसी नीतियां बनाने का जो लोगों को अपने घर में ही सम्मानजनक जीवन और रोजगार दे सकें।



