छत्तीसगढ़ महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष किरणमयी नायक पर जालसाजी का गंभीर आरोप:

पॉक्सो एक्ट की कार्रवाई रोकने के लिए ‘निजी लेटरहेड’ का हुआ इस्तेमाल**
**रायपुर/बिलाईगढ़:**
महिलाओं और बच्चों को न्याय दिलाने के लिए स्थापित एक प्रतिष्ठित अर्ध-न्यायिक संस्था की साख पर उस समय गंभीर सवाल खड़े हो गए, जब छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष किरणमयी नायक द्वारा कथित जालसाजी का एक बड़ा मामला उजागर हुआ। यह पूरा विवाद बिलाईगढ़ नगर पंचायत के मुख्य नगर पालिका अधिकारी (सी.एम.ओ.) सुशील चौधरी से जुड़े प्रकरण (प्रकरण क्रमांक-20) से संबंधित है। आरोप है कि गंभीर ‘पॉक्सो’ (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण) अधिनियम के तहत होने वाली कार्रवाई को रोकने के लिए पद का दुरुपयोग और दस्तावेजों में हेरफेर किया गया है।
सामने आए शासकीय दस्तावेजों से किसी बड़ी आपराधिक मिलीभगत और कानून के साथ खिलवाड़ किए जाने के संकेत मिलते हैं। इस पूरे ‘जालसाजी के खेल’ की चार प्रमुख कड़ियां इस प्रकार हैं:
**1. 48 घंटे के भीतर रहस्यमयी तरीके से बदला गया फैसला (यू-टर्न)**
शुरुआत में महिला आयोग की अध्यक्ष किरणमयी नायक ने सारंगढ़-बिलाईगढ़ के कलेक्टर को एक आधिकारिक पत्र भेजकर अनावेदक पर पॉक्सो अधिनियम जैसी गंभीर धाराओं के तहत तत्काल कार्रवाई करने का आदेश दिया था। लेकिन महज 2 दिन (48 घंटे) बाद, बिना किसी कानूनी प्रक्रिया या आयोग की आधिकारिक बैठक के, उन्होंने अपने ‘निजी लेटरहेड’ (व्यक्तिगत पत्र) का उपयोग करते हुए कलेक्टर को दूसरा पत्र लिखा और उक्त कार्रवाई को तुरंत रोकने का निर्देश दे दिया।
**2. पुरानी तारीखों (बैक-डेटिंग) का शातिर खेल**
सरकारी दस्तावेजों पर दर्ज तारीखों में भारी विरोधाभास देखने को मिला है। पत्र के ऊपरी हिस्से में 08/11/2026 और 01/08/2025 जैसी असंगत तारीखें लिखी गई हैं, जबकि नीचे संलग्न ‘आदेश पत्र’ पर 06/07/2026 अंकित है। विशेषज्ञों के अनुसार यह कोई साधारण टाइपिंग की गलती नहीं है, बल्कि यह पिछली तारीखों में फर्जी दस्तावेज (बैक-डेटिंग) तैयार करने का एक सुनियोजित प्रयास है।
**3. अंतिम फैसले के बाद ‘आदेश पत्र’ ही कर दिया गया गायब**
आरोप है कि जब आयोग की सुनवाई पूरी हो चुकी थी और अंतिम निर्णय व अनुशंसा पर हस्ताक्षर हो गए थे, तब स्थापित नियमों को दरकिनार करते हुए पूरे ‘आदेश पत्र’ को ही बदल दिया गया। कानूनी रूप से हस्ताक्षरित आदेश को इस तरह चुपचाप बदलना सेवा नियमों का सीधा उल्लंघन और एक गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है।
**4. आयोग की सदस्या के हस्ताक्षर हटाए गए**
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मूल ‘आदेश पत्र’ पर अध्यक्ष किरणमयी नायक के साथ-साथ आयोग की सदस्या श्रीमती सरला कोसरिया के भी संयुक्त हस्ताक्षर थे। लेकिन जो नई और संशोधित शीट सामने आई है, उसमें से सदस्या के हस्ताक्षर ही गायब कर दिए गए हैं। अब उस पर केवल अध्यक्ष के एकल हस्ताक्षर मौजूद हैं, जो यह स्पष्ट करता है कि सदस्या की सहमति के बिना यह पूरी प्रक्रिया पिछले दरवाजे से अंजाम दी गई।
**प्रशासन और सरकार से की गई ये प्रमुख मांगें:**
इस गंभीर मामले के खुलासे के बाद न्याय प्रणाली की गरिमा को बनाए रखने के लिए निम्नलिखित सख्त कदम उठाने की मांग की जा रही है:
* **दस्तावेजों की जब्ती:** आयोग के मूल रजिस्टरों, आदेश पत्रों और अध्यक्ष द्वारा ‘निजी लेटरहेड’ पर कलेक्टर को लिखे गए उस विवादित पत्र को तत्काल प्रभाव से जब्त किया जाए।
* **प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज हो:** शासकीय अभिलेखों के साथ जालसाजी (कूट रचना), धोखाधड़ी और पद के दुरुपयोग के इस मामले में तुरंत एफआईआर दर्ज कर आपराधिक कार्रवाई शुरू की जाए।
* **उच्च स्तरीय जांच:** इस पूरे ‘पॉक्सो आदेश बनाम व्यक्तिगत पत्र’ के खेल की एक समयबद्ध प्रशासनिक और आपराधिक जांच करवाई जाए।
**मुख्यमंत्री और शीर्ष नेतृत्व से लगाई गई न्याय की गुहार**
शिकायतकर्ताओं ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, उपमुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के तमाम शीर्ष नेताओं व मंत्रियों (जिनमें नरेंद्र मोदी, अमित शाह, डॉ. रमन सिंह, अरुण साव, विजय शर्मा, ओ.पी. चौधरी आदि शामिल हैं) का ध्यान इस ओर आकृष्ट करते हुए कहा है कि छत्तीसगढ़ में सुशासन की सरकार है। महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले संवेदनशील कानून के आदेशों को अगर व्यक्तिगत रसूख के दम पर बदला जाने लगेगा, तो यह पूरी प्रशासनिक व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है। दोषियों की निष्पक्ष जांच कर उन्हें सलाखों के पीछे भेजना अत्यंत आवश्यक है ताकि जनता का न्याय प्रणाली पर विश्वास कायम रहे। सत्यमेव जयते!




